मंटो की शख्सियत कितनी दिलचस्प थी , आइए जानते है मंटो जयंती पर

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सआदत हसन मंटो की आज जयंती है. उनका जन्म 11 मई 1912 को हुआ था. वह उर्दू के सबसे बड़े कलमनिगार थे. उन्होंने अपनी कलम से ऐसी रचनाएं लिख डालीं जिसे आज तक याद किया जाता है. उनकी लिखावट बहुत लोगों के लिए आग है तो वहीं कइयों के लिए मरहम. आइए जानते हैं उनके जीवन से जु़ड़ी कुछ खास बातें…

मंटो ने क्या लिखा और कितना लिखा ये उनकी मौत के करीब 60 साल बाद शायद उतना जरूरी नहीं है जितना ये कि उन्होंने जो लिख दिया वो आज भी हमारे समाज की हकीकत है और उसे आइना दिखाने का काम कर रहा है.साहित्य में दिलचस्पी रखने वालों के लिये मंटो कभी इस दुनिया से रुखसत ही नहीं हुये. उनकी कहानियां बंटवारे और उसके फौरन बाद के दौर में जितनी मौज थीं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं.हिंदुस्तान में 1947 से पहले उन्हें अपनी कहानी ‘धुआं’, ‘बू’ और ‘काली सलवार’ के लिये मुकदमे का सामना करना पड़ा तो वहीं विभाजन के बाद पाकिस्तान में ‘खोल दो’, ‘ठंडा गोश्त’ और ‘उपर-नीचे-दरमियान’ के लिये मुकदमे झेलने पड़े.मंटो ने समाज की हकीकत दिखाई लेकिन उन पर अश्लीलता के आरोप भी लगे.

मंटो इन आलोचनाओं से डरे नहीं और उन्होंने बड़ी बेबाकी से इनका जवाब दिया. आलोचनाओं के जवाब में वह कहते थे, ‘अगर आपको मेरी कहानियां अश्लील या गंदी लग रही हैं तो जिस समाज में आप रह रहे हैं वो अश्लील और गंदा है. मेरी कहानियां समाज का सच दिखाती हैं

सिर्फ 43 साल की उम्र पाए मंटो की शख्सियत को समझने को पंजाब के साथ हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी पंजाब को भी जोड़ना होगा. मुनव्वर राणा कहते हैं, ‘‘पंजाब के बंटवारे का जो दर्द था वो उनकी कहानियों से झलका. दोनों तरफ जुल्म हुए और एक जैसा सलूक हुआ. कसूरवार दोनों तरफ के लोग थे. मंटो इसलिये विवादित हुए क्योंकि उनकी कहानियों में इधर के पंजाब की कहानियां भी मौजूद थीं और उधर के पंजाब की भी.

एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, ‘उर्दू का सबसे बड़ा अफसानानिगार आठवीं जमात में उर्दू में फेल हो गया.मंटो भले अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनका साहित्य उनके नाम के साथ उर्दू अदब की दुनिया को हमेशा रौशन करता रहेगा.