‘आराम’, क्या है ? मां को नहीं मालूम

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वो स्पर्श मां की ऊंगलियों का हमारे सर को सहलाने, आंचल में लपेट कर हर बलाओं से बचाने और गोद में समेट कर दुआओं की बरसात करने का हो तो यकीन मानिए, स्पर्श का वो पल इस दुनिया में जन्नत पाना है. बच्चे हमेशा से इस स्पर्श का सुख मात्र प्राप्त करने के लिए मां के आंचल की तलाश किया करते हैं. तभी तो स्वर्ग के देवता भी ममत्व का सुख पाने के लिए धरती पर अवतरित होने को लालायित रहते थे.पर वक्त बदला, हालात बदले और साथ ही बदल गये अहसास और भावनाओं को व्यक्त करने के तरीके. मां का आंचल तो ममता के फसल से वैसे ही लहलहाता रहा, पर पर तकनीकी विकास के दौर में बच्चों की भावनाएं सोशल नेटवर्किग साइट्स के ओर पड़ने लगे. अब हालात ये हो गये हैं कि सोशल साइट्स पर माता-पिता के लिए लोगों के उड़ेले गये इस प्यार से पूरी दुनिया तो वाकिफ हो जाती है पर उनके माता पिता ही इस प्यार से अछूते रह जाते हैं, क्योंकि वो इस तकनीकी पहुंच से कोसों दूर होते हैं.

पर जरा सोच कर देखिए माता-पिता की ओर बढ़ा आपका एक कदम उन्हें सालों की वो खुशियां दे सकता है जैसे बरसों तपते रेगिस्तान में किसी ने पानी की बौछार कर दी हो. प्यार से संग गुजारे आपके चंद पल उनके जीवन जीने की ललक को और मजबूत कर देंगे. और यकीन मानिए, सोशल साइट्स पर गुजारे चैबीस घंटे आपको वो आनन्द की अनुभूति नहीं दे पाएंगे जो माता-पिता के गले लग कर गुजारे चैबीस पलों में आपको नसीब हो जाएगी. तो फिर देर किस बात की, इस मदर्स डे सोशल साइट्स की फंतासी वाली गलियों से बाहर निकल मां को प्यार भरी जादू की झप्पी दीजिए और बोल डालिए लव यू मां.बच्चे को मां की गोद में जो इल्म मिलता है, वो दुनिया में कहीं नहीं मिलता. बच्चे की ज़िद, गुस्सा उसके रोने -खेलने के हर लम्हे को मां जीती है. मां उसके आधे-अधूरे अक्षरों से शब्द, और शब्दों से किस्से बनाती है. बच्चा सबसे ज्यादा मां के ही साथ रहता है तो उनसे लड़ने-झगड़ने, शिकायत-शिकवे करने में सहज रहता है.

घर का काम नहीं आता, क्या सोचेंगे वो लोग. अब इस बात पर मेरे मन में सवाल आता है. जब भाई की शादी हो रही थी, तब मां ने उससे एक बार भी नहीं कहा था. अपना कमरा समेटना सीख जा. क्या सोचेगी बहू? कैसा फूहड़ लड़का है. खाना खाकर हॉट-पॉट भी बंद नहीं होता. काम से आते ही खाने के लिए चाहिए. खाना खाते ही पैर फैला के सोने चल दो. मां ने भाई को ये सब नहीं समझाया. मुझे पूरा यकीन है ना ही उसकी मां ने अपने बेटे को समझाया होगा, जिस घर जाने के नाम पर मुझे रोज सुनाया जाता है. क्योंकि ये बदलाव आने में पीढ़ियां लगेंगी. मैं समझती हूं, मर्दों को ये सब समझना-समझाना बकवास लग रहा होगा. पर जिस दिन वो समझेंगे उसी दिन से बदलाव आएगा.

मां को लगता है लड़की ने झाड़ू-पोछा नहीं लगाया, कपड़े नहीं धोए, खाना नहीं पकाया तो वो निकम्मी है. वो बेटे तरह दफ्तर जाती है, पैसा कमाती है. उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि ये उस लड़की की अपनी चॉइस है. दुनिया के लिए वो लायक तब कहलाएगी जब घर संभालेगी. मां की समझ यहीं तक है. ‘आराम’, क्या है ? मां को नहीं मालूम. उन्होंने अपना आराम उसमें ढूंढा जो उनपर लाद दिया गया. जिसमें उन्हें उलझन हुई उसे उतारकर नहीं फेंका. कुछ नया उन्होंने लोगों के डर से नहीं किया. वो तो सोती-जागती भी औरों की सुविधा के मुताबिक हैं. मां ये सारी कुर्बानियां सिर्फ इसलिए देती हैं क्योंकि वो भोली हैं. मासूम हैं. अपनी ज़िंदगी पर अपना हक़ नहीं जताती. अगर मैं वैसी नहीं हुं तो उसमें कुछ भी गलत नहीं है.

सुबह उठने के वक्त से लेकर बिस्तर लगाने तक. जितनी बातों पर टोका जाता है. अब एक-एक बात पर तसल्ली से गौर करती हूं तो सच में सिर्फ ये दिखता है कि वो मासूम हैं.

हमें परिवार से शिकायत होती है, उनसे लड़ते-झगड़ते हैं. हम रोते हैं, हंसते हैं. पर वही चीजें हमें हमेशा के लिए बदल देती हैं. हम उस बदलाव के गवाह होते हैं. एक वक्त के बाद लगता है सब बीता हुआ कल है और हम अपने रास्ते खुद बनाते हैं. नई राहों पर हमारे लिए बीता कल मायने नहीं रखता. अपने अंदर आए बदलावों के बाद उसी परिवार के साथ होते हैं जिनसे हमें अनगिनत शिकायतें थीं. अहसास होता है, सभी की ज़िंदगी में उथल पुथल होती है, रायता फैलता है. हर कोई खुद ही उससे निपटता है. हमारे अलावा कोई हमें नहीं बदल सकता. यही ज़िंदगी है.

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